Tuesday, January 14, 2014

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Saturday, May 11, 2013

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Tuesday, January 8, 2013


पेट पर फिर गोदी जाएंगी गर्म सलाखें

टुसू पर्व : रोंगटे खड़ी करने वाली है आदिवासी समुदाय की परंपरा  


कल्पना कीजिए कि आग में तपा कर गर्म की हुईं लोहे की लाल सलाखें हों और उससे जिंदा इंसान के पेट पर गोदा जाए तो कैसा लगेगा? ऐसी कल्पना ही रोंगटे खड़े कर देनेवाली हैं। लेकिन हकीकत में ऐसा किया जाता है। आदिवासी समुदाय के लोग टुसू पर्व (मकर पर्व) के मौके पर छोटे-छोटे बच्चों के पेट (नाभी के इर्दगिर्द) गर्म सलाख गोदते हैं। ऐसा सजा देने के लिए नहीं किया जाता बल्कि उसके भले के लिए किया जाता है। आप सोच रहे होंगे कि किसी को गर्म सलाखों से गोदने से कैसे किसी का भला हो सकता है, तो बता दें कि इस मामले में विज्ञान का तर्क काम नहीं करता बल्कि आदिवासी मान्यता का पालन करते हुए ऐसा किया जाता है। आदिवासी समुदाय में यह परंपरा काफी पुरानी है। समुदाय की मान्यता है कि ऐसा करने से पेट की बीमारियां ठीक होती हैं।
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परंपरा कुछ ऐसी : मकर संक्रांति के दिन सुबह-सुबह गांव के अखाड़े में अलाव जलाया जाता है। इसी अलाव में लोहे के तार (पतली सलाखें) गर्म की जाती है। सलाखें तब तक गर्म की जाती हैं जब तक वह सुर्ख लाल नहीं हो जातीं। इसके बाद पांच से दस वर्ष के बच्चों को खाट पर लिटा कर सलाख से दागा जाता है। कई वयस्क भी खुशी-खुशी अपने पेट पर सलाख दगवाते हैं। सलाख से जिन लोगों को दागा जाता है उन्हें पुरस्कार स्वरूप गुड़ पीठा व मूढ़ी भेंट किया जाता है।
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ऐसी है मान्यता : समुदाय के लोगों का दृढ़ विश्वास है कि पेट में सलाख गोदवाने के बाद आजीवन पेट की बीमारी से निजात मिल जाती है। कई लोग जिन्हें पेट संबंधी बीमारी हुई, इस विश्वास की पुष्टि भी करते हैं। वैसे कई गैर आदिवासी लोग भी इस अवसर पर अपना पेट गोदवाते हैं।
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इनकी सुनिए...
परसुडीह क्षेत्र के सरजामदा गांव में बच्चों को सलाख से गोदने वाले छोटू मुर्मू कहते हैं-'मैं कई वर्षों से सलाख गोदने का काम कर रहा हूं। इससे किसी को भी कभी नुकसान नहीं हुआ है। हर साल खुशी-खुशी लोग इस अनुष्ठान में शामिल होते हैं। सलाख गोदना कला है, इसमें इस बात का खास ख्याल रखना पड़ता है कि पेट के विशेष नसों के आसपास निर्धारित स्थान पर ही गोदा जाए। इससे निश्चित रूप से फायदा होता है। ऐसा न होता तो गर्म सलाखें अपने जिंदा शरीर पर कौन गोदवाता? यह परंपरा तंत्र विद्या पर नहीं बल्कि पुरानी व्यावहारिक शारीरिक चिकित्सा पद्धति पर आधारित है।Ó
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भादो माझी  

Thursday, March 15, 2012

संथाली फिल्म महोत्सव के विवाद का 'चैप्टर क्लोजÓ


Bhado Majhi : शहर के आदिवासी दर्शकों को इस बार दो-दो फिल्म महोत्सव देखने का मौका मिलेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि दो-दो फिल्म महोत्सव आयोजित किए जा रहे हैं। एक फिल्म महोत्सव 11 से 15 अप्रैल तक चलेगा तो दूसरा पांच मई को आयोजित किया जाएगा। ऐसा नहीं है कि जमशेदपुर में पहली बार दो फिल्म महोत्सव आयोजित किए जा रहा, बल्कि पहले भी दो आयोजन होते थे, लेकिन प्रतिस्पद्र्धा और विवाद के कारण दोनों ही आयोजन एक ही दिन किए जाते थे। इस बार ऐसा नहीं है।
दोनों संथाली फिल्म महोत्सव के लिए अलग-अलग तिथियों की घोषणा करना इन दोनों ही आयोजनों के बीच की प्रतिस्पद्र्धा के समाप्त होने की ओर इशारा कर रहा है। साफ है कि अब महोत्सव के नाम पर शक्तिप्रदर्शन नहीं, बल्कि कला का प्रदर्शन होगा। पिछले साल रमेश हांसदा व सूर्य सिंह बेसरा इसी आयोजन को लेकर भिड़ गए थे, लेकिन इस बार रमेश हांसदा के नेतृत्व में हो रहा आयोजन जहां 15 अप्रैल को समाप्त हो जाएगा तो वहीं सूर्य सिंह बेसरा का आयोजन पांच मई को पंडित रघुनाथ मुर्मू की जयंती के मौके पर किया जाएगा। 'रास्काÓ के बैनर तले होने वाले सूर्य सिंह बेसरा के फिल्म महोत्सव की तैयारियां भी शुरू हो चुकी है। बेसरा ने बताया कि पांच मई को फिल्म महोत्सव सह पुरस्कार वितरण समारोह का आयोजन किया जाएगा। इस अवसर पर संथाली व क्षेत्रीय फिल्मों के विकास पर भी मंथन करने के साथ एक रोडमैप तैयार किया जाएगा। उधर 'आइसफाÓ (ऑल इंडिया संथाली फिल्म एसोसिएशन) के बैनर तले होने जा रहे फिल्म महोत्सव के बारे रमेश हांसदा ने बताया कि महोत्सव में नृत्य प्रस्तुति देने हेतु ऑडिशन का कार्यक्रम शुरू हो चुका है। शीघ्र ही फिल्मों की स्क्रीनिंग भी की जाएगी। रमेश ने बताया कि फिल्म महोत्सव 11 अप्रैल को शुरू होकर 15 अप्रैल को गोपाल मैदान में भव्य आयोजन के साथ समाप्त हो जाएगा।
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पहले बेसरा-रमेश थे साथ
पहली बार जब फिल्म महोत्सव का आयोजन जमशेदपुर में किया गया तब रमेश हांसदा व सूर्य सिंह बेसरा एक ही बैनर तले इसका आयोजन करते थे, लेकिन विवाद हो जाने के कारण बाद में वे अलग हो गए। अलग होने के बाद विवाद और प्रतिस्पद्र्धा ऐसे बढ़ी कि दोनों एक ही तिथि पर एक ही आयोजन अलग-अलग जगह करने लगे। पिछली बार जमशेदपुर के कलाप्रेमी इस प्रतिद्वंद्विता के गवाह भी बने।

Sunday, December 4, 2011

"दूसरे भारत" में बसती है मंजू की दुनिया


जादूगोड़ा स्थित डुंगरीडीह गांव में मंजू देवी 
भादो माझी, जादूगोड़ा 
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गोद में मासूम बच्चा। इस बात से अनजान कि उसकी मां भूखे रह कर उसे दूध पिला रही है। बच्चे की आंखे बिल्कुल मासूम, लेकिन न जाने क्यों फिर भी उसकी ये मासूम आंखे सवाल करती सी नजर आती हैं? सवाल यह कि भूखे पेट कबतक उसकी मां अपने खून को दूध का शक्ल देकर पिलाती रहेगी...? सवाल यह कि कब तक उसके पिता दस-दस रुपए के लिए अपने खून को पसीने की कीमत पर बेचते रहेंगे...? सवाल यह कि क्या यही उनकी नियति है...? 
मासूम आंखों के इन सवालों का सटीक जवाब तो किसी के पास नहीं, लेकिन इन सवालों के जवाब में एक सवाल जरूर है। सवाल यह कि कब तक ऐसे हालात रहेंगे? 11 साल हो गए। ...और कितना वक्त चाहिए झारखंड को? क्या झारखंड के गांवों में जन्म लेने वाले बच्चों की आंखे यही सवाल दोहराती रहेंगी?
झारखंड के इस बेबसी की जीवंत तस्वीर आज भी मेट्रो-लाइफ स्टइल वाले शहरों से ज्यादा दूर नहीं। जिस मजबूर मासूम का जिक्र हम कर रहे हैं उसकी मजबूरी की झलक भी देश के प्रथम नियोजित (प्लान्ड) शहरों में शामिल जमशेदपुर शहर से महज 14 किमी दूर भाटिन के डुंगरीडीह (जादूगोड़ा) गांव में ही दिखी। यहां मंजू देवी ने अपने पति व छोटे-छोटे बच्चों संग दुनिया बसाई है। उसकी इस दुनिया को 'दूसरे' भारत की तस्वीर कहा जा सकता है। सूखी झाडिय़ों से बनी झोपड़ी में 13 डिग्री तक ठंडी रात ठिठुर कर गुजारने वाले इस परिवार की हकीकत झारखंड के 11 साल के सफर को खुद बयां करती है। पेट की चिंता ने कुछ समय पहले इस परिवार को दुमका से जिलाबदर कर पूर्वी सिंहभूम पहुंचा दिया। दुमका में पहले खेती-बाड़ी से काम चल जाया करता था, लेकिन सूखे व सिंचाई की व्यवस्था न होने के कारण तंगहाली का आलम इस कदर बिगड़ा कि यहां (पूर्वी सिंहभूम) में खजूर के पेड़ से रस जुटा कर बेचने की नौबत आ गई, अब तो इसी से पेट पल जाता है। देसी भाषा में खजूर के इस रस को ताड़ी कहते हैं। ठंड का मौसम है सो किसी तरह बस 10-20 रुपए रोजाना की कमाई हो जाती है। बस इतने में रोटी का इंतजाम करना होता है। महंगाई के इस जमाने में 20 रुपए में एक किलो आटा मुश्किल से मिल पाता है, ऐसे में इतनी ही कमाई में काम चलाना होता है। गर्मी में तो 60-70 रुपए कमाई हो जाती है, लेकिन ठंड में एक-एक दिन तो भूखे रहने की स्थिति आ जाती है।
सूखी झाडिय़ों से बनाए घर में रात गुजरती है। मंजू कहती हैं-''पति अमरूद चौधरी ताड़ी से हमारा पेट पालते हैं। किसी-किसी दिन रोटी नसीब नहीं हो पाती तो ताड़ी पीकर ही सो जाया करते हैं। क्या करें, पढ़े लिखे हैं नहीं, करें भी तो क्या?" सरकारी सुविधाओं के बारे पूछे जाने पर मंजू कहती हैं-''वोट वाला कार्ड तो है बाबू, लेकिन ब्लॉक के बड़े बाबू कहते हैं कि हम दुमका वाले हैं इसलिए इहां हमारा लालकार्ड नहीं बनेगा। मुख्रिया को बोले तो वो हजार रुपया मांगते हैं, बोलते हैं रुपया दो तो हम तुम्हारे अर्जी पर अंगूठा का छाप लगा देंगे। अब हम हजार रुपया कहां से लाएं। खाने का तो ठेकान नहीं....?
मंजू देवी की इस दुनिया में दुमका से पलायन करने की मजबूरी दिखती है, सूबे में पेट पालने के अवसरों की अनुपलब्धता भी दिखती है तो वहीं सरकारी व्यवस्था में पड़ा छेद भी दिखता है। कहा जा सकता है कि मंजू देवी की दुनिया विकासशील भारत से बिल्कुल जुदा है, और उनकी दुनिया अलग भारत में बसती है। उस भारत में जिसमें अमरों का इंडिया अलग है और गरीबों का भारत अलग...। मंजू की दुनिया उसी दूसरे भारत में बसती है....।

Wednesday, November 2, 2011

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Sunday, October 16, 2011

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jamshedpur good friday

पुण्य शुक्रवार पर पाप परास्त

..प्रिय! अभी आप चाहे कैसी भी दशा या परिस्थिति में क्यों न हों, चाहे आपका परिवार या समाज आपको दोषी ठहराए, पुनरुत्थित यीशु आपको अपनी संतान बनाना चाहता है। वह आपको पूरी रीति से बचाना चाहता है, आपको मृत्यु के भय या अकेलेपन से स्वतंत्र करना चाहता है। आपके पास एक न समाप्त होने वाली आशा है..यीशु में, जिसने मृत्यु की घाटी को पार किया और मृत्यु पर विजय पाई। क्या आप उसके हाथों में अपने जीवन को सौंपेंगे? वह आपको मृत्यु के गहन अंधकार से छुड़ाएगा। वह आपको पूरी रीति से आपको सुरक्षित बचाए रखेगा और आपका उद्धार करेगा। आनेवाले संसार में भी, वह आपका स्वागत करेगा और आपको चूमेगा, अनंत प्रसन्नता देगा।
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भादो माझी, जमशेदपुर : शुक्रवार को न सिर्फ लौहनगरी बल्कि पूरे विश्व के ईसाई धर्मावलंबियों ने गुड फ्राइडे (पुण्य शुक्रवार) मनाया। मसीहियों के लिए क्षमा व त्याग का नाम है गुड फ्राइडे। आज के ही दिन यीशु मसीह दूसरों के पापों को मिटाने के लिए क्रूस पर चढ़ गए थे। इस दिन शहर भर के गिरजाघरों में यीशु के आदर एवं स्तुति में दिन भर उपवास करते हुए शोक सागर में डूब कर उनके दुख, मरण एवं यातना पर मनन-चिंतन और प्रार्थना किया गया। जमशेदपुर धर्मप्रांत के बिशप फेलिक्स टोप्पो ने इस मौके पर सुसमाचार बताते हुए संदेश दिया कि प्रभु यीशु मसीह सृष्टिकर्ता व मुक्तिदाता हैं। उनके पदचिन्ह क्षमा और प्रेम का संदेश देते हैं। उन्होंने कहा कि गुड फ्राइडे हर किसी के लिए  गौरव व प्रायश्चित का दिवस है।
प्रभु की पीड़ा को किया याद : शहर के तमाम गिरजाघरों में पहुंचकर ईसाई समुदाय के लोगों ने प्रभु यीशु मसीह की पीड़ा को याद कर प्रायश्चित के लिए प्रार्थना की। मान्यताओं के मुताबिक तीन घंटे तक क्रूस पर टंगे होने के बाद काफी कष्टपूर्ण स्थिति में दोपहर तीन बजे प्रभु यीशु ने प्राण त्यागे थे, इसलिए अधिकांश गिरजाघरों में दोपहर तीन बजे ही गुड फ्राइडे के कार्यक्रम की शुरुआत हुई। इस दौरान प्रभु के कष्टपूर्ण मौत को याद किया गया, और काले कपड़े पहन कर क्रूस को चूमा गया। बिष्टुपुर स्थित संत मेरीज चर्च से लेकर संत जोसेफ कैथेड्रल चर्च तक और टेल्को स्थित लुपिता चर्च समेत जीईएल चर्च सीतारामडेरा, जीईएल चर्च मानगो, संत रोबर्ट चर्च परसुडीह, संत बरनाबस चर्च शंकरपुर व कीताडीह चर्च  में दोपहर के 11 बजे से ही गुड फाइडे के उपलक्ष्य में प्रार्थनाएं आरंभ कर दी गईं थीं।
सभी गिरजाघरों में थी विशेष तैयारियां :- गुड फ्राइडे के दिन तपती गर्मी को मद्देनजर रखते हुए कई गिरजाघरों में विशेष प्रबंध किये गये थे। श्रद्धालुओं के लिए छांव की व्यवस्था करने से लेकर पीने के पानी तक का भी प्रबंध था।
तपती धूप में सड़क पर निकले मसीही :- तपती धूप में मसीही भक्ति सागर में डूब कर सड़कों पर निकले और सांकेतिक रूप से क्रूस लेकर एक चल यात्रा निकाल यीशु का अंतिम संस्कार किया। इस दौरान मसीही काले वस्त्र धारण किए हुए थे।
तीन दिन बाद जी उठेंगे यीशु :- तीन दिन बाद, यानी रविवार को प्रभु यीशु मसीह जी उठेंगे। इसकी खुशी मसीही समुदाय में ईस्टर पर्व के रूप में मनाई जाएगी। शहर में भी इसकी व्यापक तैयारी की गई है।

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Friday, October 14, 2011

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Saturday, October 8, 2011

दूरदर्शन के स्पेक्ट्रम पर भी चलेगा इंटरनेट

भादो माझी, जमशेदपुर दूरदर्शन के स्पेक्ट्रम पर भी चल सकता है इंटरनेट। जी हां, सुनने में भले यह तकनीक अजीब लगे, लेकिन जमशेदपुर शहर के रणवीर चंद्रा तिवारी ने यह तकनीक विकसित कर ली है। वाइ-फाइ की तर्ज पर इस तकनीक से दूरदर्शन प्रसारित करने वाले स्पेक्ट्रम से ही गांव-गांव में इंटरनेट चलाया जा सकता है। रेडमंड-वाशिंगटन स्थित माइक्रोसॉफ्ट हेटक्वार्टर में रिसर्चर काम कर रहे शहर के इस युवा ने वर्षों रिसर्च करने के बाद इस तकनीक को विकसित किया है, जिसे अब अमेरिका के फेडरल कम्यूनिकेशन कमीशन (एफसीसी) ने मान्यता भी दे दी है। रणवीर की रिसर्च पर आधारित तकनीक को मान्यता देने के उपरांत अब अमेरिका में टेलीविजन चैनल्स प्रसारित करने वाले स्पेक्ट्रम पर इंटरनेट सर्विस दे दी गई है। यानी टीवी के लिए जिस स्पेक्ट्रम पर ब्रोडकास्टिंग होती है उसी स्पेक्ट्रम पर इंटरनेट डेटाबेस भी उपलब्ध कराया जा रहा है। चंद्रा अब भारत में इस तकनीक को लांच करने की तैयारी में है। क्या है तकनीक : रणवीर चंद्रा ने इंटरनेट के वाइ-फाइ सिस्टम की तर्ज पर एक नया इंटरनेट डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम तैयार किया है, जिसकी मदद से पुराने टेलीविजन चैनल, मसलन दूरदर्शन उपलब्ध कराने वाले स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल कर वायरलेस इंटरनेट सुविधा उपलब्ध कराया जा सकता है। सरल भाषा में कहा जाए तो जैसे आपके ऑफिस या कॉलेज में अगर वाइ-फाइ सिस्टम लगाया गया है तो आपका लैपटॉप बिना किसी इंटरनेट कनेक्शन (डेटा कार्ड अथवा ब्राडबैैंड कनेक्शन) के ही इंटरनेट ऑपरेट करने की सुविधा देता है, बिल्कुल वैसी ही तकनीक रणवीर ने विकसित की है जो वाइ-फाइ से ज्यादा रेंज पर बिना तार व बिना डेटाकार्ड के आपके लैपटॉप पर इंटरनेट डेटा उपलब्ध कराएगी। वाइ-फाइ की तर्ज पर काम करने वाली यह तकनीक टीवी स्पेक्ट्रम पर चलेगी। टीवी स्पेक्ट्रम से क्या लेना-देना :- दरअसल वर्षों पहले जब दूरदर्शन शुरू किया गया था तब इसे प्रसारित करने वाले स्पेक्ट्रम पर सिर्फ एक ही बैैंड (दूरदर्शन) उपलब्ध कराया गया, यानी दूरदर्शन का सिग्नल भेजने वाले स्पेक्ट्रम का सिर्फ एक बैैंड (चैनल) व्यस्त हुआ। बाकी चैनल खाली रहे, जिसे तकनीकी भाषा में व्हाइट स्पेस कहा जाता है। दूरदर्शन उपलब्ध कराने वाले उस पुराने अल्ट्रा हाइ फ्रिक्वेंसी (यूएचएफ) एनालोग टीवी के बाकी स्पेक्ट्रम (व्हाइट स्पेस) जो खाली रहे, उनका उपयोग अब रणवीर इंटरनेट सिग्नल्स (डेटाबेस) भेजने के लिए करने की तकनीकी विकसित कर चुके हैैं। क्या होगा लाभ :- रणवीर की यह खोज, जिसे ‘व्हाइट-फाइ’ कहा जा रहा है, उससे उन सुदूर गांवों तक वायरलेस इंटरनेट सुविधा पहुंच जाएगी जहां दूरदर्शन आता है। रणवीर कहते हैैं-‘मैंने इस कंप्यूटर नेटवर्क डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम पर इसी लक्ष्य के साथ काम किया कि इससे गांव-गांव के लोगों तक इंटरनेट की सुविधा पहुंच पाएगी।’ अमेरिका एफसीसी ने दी मान्यता :- रणवीर की इस तकनीक को अमेरिका के फेडरल कम्यूनिकेशन कमीशन (एफसीसी) ने मान्यता दे दी है। माइक्रोसोफ्ट के रेडमंड वाशिंगटन स्थित रिसर्च लैब का दौरा कर एफसीसी के चेयरमैन जूलियस जेनाचोवस्की ने इस तकनीक को हरी झंडी दी। इसके बाद गूगल, माइक्रोसोफ्ट समेत कई बड़ी कंपनियों की अपील पर अमेरिकी में स्पेक्ट्रम व्हाइट-स्पेस (अनयूज्ड टीवी स्पेक्ट्रम) को इंटरनेट के लिए उपयोग करने का रूल पास हुआ। एफसीसी ने रणवीर की इस संचार क्रांति को 21 सेंचुरी रूरल अमेरिकी ब्राडबैैंड का नाम दिया है। भारत से रणवीर को है उम्मीदें :-दुर्गा पूजा के मौके पर जमशेदपुर के मानगो डिमना रोड स्थित ग्रीनअर्थ कॉलोनी में अपने माता-पिता से मिलने पहुंचे रणवीर कहते हैैं-‘अमेरिका ने इस तकनीक को ग्रामीण इलाकों के विकास के लिए शुरू कर दिया है, उम्मीद है कि भारत भी इस तकनीक को अपनाएगा।’ पिछले दिनों भारत सरकार के आइटी विभाग के सचिवों ने भी माइक्रोसॉफ्ट के रिसर्च विंग का दौरा कर इस तकनीकी के ताजा अपडेट लिए थे, लेकिन रणवीर कहते हैैं कि तकनीक को समझने के बाद ही भारत सरकार इस मामले में आगे बढ़ सकती है। बिहार के मुख्यमंत्री ने दिखाई दिलचस्पी :- रणवीर चंद्रा की इस ‘व्हाइट-फाइ’ तकनीक से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी खासे प्रभावित हैैं। उन्होंने रणवीर चंद्रा की इस तकनीक के संबंध में पूर्ण जानकारी लेने के लिए विभागीय सचिवों का दल अमेरिका भेजने के निर्देश भी दे दिए हैैं। अगर सचिवों ने माइक्रोसॉफ्ट का दौरा कर सकारात्मक रिपोर्ट प्रस्तुत किया तो संभव है कि बिहार से इस बाबत शुरूआत हो जाए। इसके लिए रणवीर लगातार नीतीश कुमार (मुख्यमंत्री) संग पत्राचार (ई-मेल पर) कर रहे हैैं। रणवीर ने झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा से भी इस बाबत संपर्क करने की रणनीति बनाई है।

Wednesday, August 17, 2011

जमशेदपुर - टीवी पर मार्मिक स्टोरी में नेताजी की मौजा ही मौजा



भादो माझी, जमशेदपुरः गुरुवार की एक औसत सुबह! रिमोट को सारथी बना टीवी पर कुछ सार्थक ढूंढ़ रहा था। पर ज्यादातर टीवी कायक्रम गुरुवार की सुबह से भी ज्यादा औसत थीं। धार्मिक चैनलों पर कुछ बाबा महिलाओं को शांति और संयम का पाठ पढ़ा रहे थे। नेशनल न्यूज चैनल वाले बता रहे थे कि कैसे एक बाबा ने संयम का पाठ पढऩे आई शिष्या को एक्सट्रा क्लास देने की कोशिश की। वहीं मनोरंजन चैनल्स पर सास-बहुएं एक-दूसरे को नीचा दिखाने के ऊंचे काम में लगी हैं, दूसरों का खून पी अपना हीमोग्लोबीन बढ़ा रही हैं। कल्पना के कैनवस पर हर क्षण षड्यंत्रों के दृश्य उकेर रही हैं। कभी-कभी हैरानी होती है कि धारावाहिकों में जिन परिवारों की कहानी देख हम मनोरंजन करते हैं, खुद उन परिवारों में कितना तनाव है! आखिर क्या वजह है कि दूसरे का तनाव हमें आनंद देता है? किसी का झगड़ा देख हम एंटरटेन होते हैं? क्या हम इतना गिर गए हैं...हमारे पास कुछ और काम नहीं बचा...इससे पहले कि किसी महान नतीजे पर पहुंचता, सोचा पॉकेट में चैनल आईडी ढूंसे वीडियो कैमरा लेकर कालिया चाय दुकान (डीसी ऑफिस के सामने) से जुुबिली लेक तक सड़कों पर तूफानी सैर करने वाले लोकल न्यूज वालों का करतब ही देख लिया जाए। करतब कमाल का था। लोकल टीवी पर न्यूज चल रही थी, न्यूज रीडर लाउड लिपिस्टिक पोते होंठ पहले हिला रही थे बोल बाद में रही थी। शायद टेक्निकल फॉल्ट था। बहरहाल शहर का मिजाज जानने की चस्की चढ़ी, सो टीवी वाली मैडम के होंठों को इग्नोर कर कंटेट पर ध्यान दिया। टीवी वाली मैडम ने चेहरे में हल्की मुस्कान लिए एक ऐसे मार्मिक स्टोरी दे मारी कि हमारी मैडम च.च..च.. करने लगी। दरअसल सीन मैरीन ड्राइव और रामजनमनगर का आ रहा था। पुलिस वाले विलेन और बस्ती वाले मिठुन चक्रवर्ती ब्रांड हिंदी फिल्म के गरीब गुरबा लग रहे थे। सीन ड्रामेटिक था, लेकिन इमोशनल ज्यादा लग रहा था। हमारी मैडम जी बंध गई, सो हमरा भी इस न्यूज में इंटरेस्ट दिखाना कंपलसरी था। सो लोकल न्यूज चैनल वालों की पेशकश पर नजरें टिक गईं। अतिक्रमण हटाया जा रहा था, सो लोग रो रहे थे, बिलख रहे थे। घर उजड़ रहे थे। यह सब देख च..च..च.. कंटिन्यू था। समझाने का कोई फायदा नहीं हुआ कि जमीन अवैध है तो आज नहीं तो कल हटना ही था। तपाक से सवाल दागती कि हटाना था तो बसाने समय क्यों नहीं रोका...? सवाल में दम था, सो हमारा तेवर बेदम हो गया। बहरहाल लोकल न्यूज पर इमोशनल सीन जारी था। इतने में इंट्री हुई एक शख्स की। साथ में थे उनके झंडरबरदर। न्यूज चैनल पर साहब को इंट्रोडक्शन जनप्रतिनिधि के रूप में की गई। जनाब आज रामजनमनगर में न्यूज चैनलों की बाढ़ देख जोश के समंदर में गोते पर गोते लगा रहे थे। पहले तो घर नहीं टूटने देंगे बोले, चैनल आइडी जब-जब उनकी और दिखता नेताजी बाइट (बयान) देने के लिए कॉलर टाइट कर देते। मौका मिला तो दहाड़ पड़े। प्रशासन ठीक नहीं कर रही...। हम ऐसा नहीं होने देंगे...। नापी गलत हुई है...। प्रशासन गलत कर रही है...। आदि...आदि। लेकिन नेताजी की आज चली नहीं। नारेबाजी करते विलेन बनी प्रशासन के आगे-पीछे होते रहे। फिजिकल प्रेजेंस जरूरी थी, आखिर अगली बार का सवाल जो था। नेताजी ने इतने समय में जितनी बार आग उगला उतनी बार उनके चेहरे पर वीरता के भाव दिखे। लेकिन उजड़ी जनता को आज फुर्सत न थी अपने गम से। पहले तो नेताजी पर उम्मीद जताई, लेकिन हांकता व फांकता देख नेताजी को देख खुद भी बगले झांकने लगे। नेताजी लोकल लीडर हैैं, लेकिन आज सिर्फ टीवी वाले उनके वोटर लग रहे थे। टीवी वालों को छोड़ कोई पूछ नहीं रहा था। सिर्फ वही क्यों, फ्लैशबैक पर टीवी में एक और चेहरा नहीं टूटने देंगे मकान के दावे करता दिखाया जा रहा था। साहब सरकार की पार्टी के हैैं। एक बार सत्ता की धाक दिखाई भी, बस्ती को बचाया भी। लेकिन चुनाव खत्म और साहब के दर्शन दुर्लभ। इन चैनल वालों की याददाश्त भी बड़ी जालिम होती है। चुनाव के पहले की बात अब तक याद रखे हुए हैैं। भई चुनाव खत्म अब तो बख्श दो नेताजी को। बेचारे हार भी गए हैैं। नहीं आए तो नहीं आए, आखिर लोकल लीडर आए तो थे, क्या हो गया। घर टूट ही न गया। लेकिन चैनल वालों की तरह हमारी मैडम भी बड़ी तीखी निकली...बोलीं नेता कभी नहीं सुधरेंगे। राजनीति की रोटी सेंकनी हों तो चिता की आग भी न छोड़ें...। शायद मैडम सही हैैं.... !

Wednesday, August 10, 2011

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Sunday, May 8, 2011

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Saturday, May 7, 2011

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Monday, May 2, 2011

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 करप्शन का 'टॉयलेट ट्विस्ट'
पत्रकार हूं, अड्डाबाजी पेशे की जरूरत है। रात को नींद कहां आती। जबतक रेलवे स्टेशन की घड़ी में दो बजता नहीं देख लूं नींद आस-पास तक नहीं भटकती। रविवार की रात को भी कुछ ऐसा ही हुआ। आज इंडिया अगेंस्ट करप्शन के मेले में भीड़ बढ़ाकर मैैं भी लौटा था, जमशेदपुर में खूब भीड़ जुटी। लगा भ्रष्टाचार से लौहनगरी ही ज्यादा त्रस्त है, या फिर यहीं के लोग ज्यादा फुर्सतिया हैैं। खैर, रीगल मैदान में मैैं भी 'मुंडी गिनानेÓ के लिए शामिल हो गया। दिल साफ हो न हो, लेकिन मन में इतनी बात ठानी थी कि भीड़ के मामले में जमशेदपुर कमजोर न दिखे। शायद भ्रष्टाचार के खिलाफ मन में थोड़ी सी चिंगारी भी सुलग चुकी थी। मैदान में ईमानदारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लडऩे का संकल्प लेकर आया था, सो यह मन में जरूर ठाना था कि आज से एक हफ्ते 'करप्शन-फ्री वीकÓ मनाउंगा। वैसे भी करप्शन में लिप्त होने का मौका तो कम ही मिलता रहा है, अब यह ठान चुका था कि भ्रष्टाचार बर्दाश्त भी नहीं करुंगा।  लेकिन शाम के पांच बजे से रात के दो बजे तक की मेरी जिंदगी के छोटे से सफर के दौरान मुझे नीम से भी ज्यादा कड़वा अनुभव हुआ। इतना कड़वा कि शहर की एक भी गतिविधि मेरे गले से नीचे उतर ही नहीं रही थी। भ्रष्टाचार का कॉकटेल से हर किरदार मुझे नहाया नजर आया।
शुरुआत रीगल मैदान से ही हुई। उस जगह से, जहां मैने अपनी फटफटी शान से पार्क की थी। जल्दबाजी में गाड़ी सड़क किनारे लगा दी थी, लौटा तो पत्रकारिता की सारी ठसक उस समय डगमगाने लगी जब सीटी बजाते सिपाही ने गाड़ी पर हाथ रख दिया और बोला-का...हीरो, कहां चल दिए। यहां गाड़ी पार्क करना मना है।। मन में विचार आया कि पत्रकारिता झाड़ कर सिपाहीजी को चलता कर दूं, लेकिन ईमानदारी की पाठशाला से कसमे-वायदे खाकर लौट रहा था, सो सोचा कोई गलत काम न करुंगा। भारी मन से खुद को समझाया कि आज तो कम से कम  दो सौ रुपए फाइन दे ही दूं...। लेकिन मेरे मन के भीतर चल रहे 'वल्र्ड-वारÓ के खत्म होने से पहले ही सिपाहीजी अपना लार टपकने से रोक न सके, और सोले के सुरमा भोपाली के अंदाज में बोले- निकालों सौ रुपए...। फाइन करुंगा तो लगेंगे दो सौ...। मन किया कि ईमानदारी का लंबा-चौड़ा लैक्चर दे डालूं खाखी वाले चोर को। लेकिन खुद को संभाला और आई-कार्ड की चमकी दिखा कर भ्रष्टाचार को नमस्कार कर निकल गया। थोड़ी देर उस सिपाही को मन में कोसा कि सिपाही ने खुद तो भ्रष्टाचार किया ही भ्रष्टाचार का विरोध करने का फीता काटने उतरे नए खिलाड़ी को, यानी मुझे  ईमानदार भी नहीं बनने दिया। खैर यहां नहीं तो आगे सही की सोच कर बढ़ा स्टेशन की ओर। 20 की मस्त स्पीड में फटफटिया का फेफड़ा फूंकते बढ़ ही रहा था कि बस थोड़ी देर में लोग सड़क का डिवाइडर से मोटरसाइकिल की जंग कराते दिखे। हर कोई इस फिराक में दिखा कि डिवाइडर फांद कर  किसी तरह जंग जीत ले। जाम लगा नहीं था, सड़क खुली थी, फिर लोग बारिश से ठंडे हुए मौसम में पसीना क्यों बहा रहे...??? यह सवाल जेहन में ठक-ठक कर ही रहा था कि आगे दो पुलिसकर्मी फटफटी चेकिंग में मस्त दिखे। समझ गया... लोग बिना हेलमेंट...बिना लाइसेंस के सड़क पर तफरीह कर रहे थे, इसलिए मारे डर के डिवाइडर का जीना मुहाल किए हुए थे। ऐसे भगोड़ों को देखना नई बात नहीं थी, लेकिन आज यह सब भ्रष्टाचार विरोधी चश्मे से देख रहा था, इसलिए नोटिस में आ रहा था। अफसोस हुआ...लगा...हम ही बेइमान...दूसरों से कैसे करें ईमानदारी की उम्मीद। आगे बढ़ा तो सिपाहियों ने ऊपर से नीचे टटोल डाला। लाइसेंस देखा, हेलमेट की तस्दीक की। फिर कुछ बोलते न बना तो टूटे दिल से बोले ..जाइए...। उनका जाइए  बोलना ऐसा  था मानों वे मुझे ग्र्राहक मान रहे हों, और मुझसे उन्हें नाउम्मीदी मिली हो। यहां फिर अन्ना पर अफसोस हुआ, उनके अभियान के संभावित परिणाम की कल्पना कर अफसोस हुआ।
पुलिस वालों के नाउम्मीद चेहरों को दूसरा मुल्ला खोजने के लिए छोड़ आगे बढ़ा। अब बारी स्टेशन की थी। प्लेटफॉर्म पर पत्रकार मंडली पहले से ही अड्डाबाजी की ड्यूटी बजा रही थी। शरिक हुआ तो भ्रष्टाचार...अन्ना...अभियान...सबकी चर्चा चली। लेकिन आज मेरी आंखों में जो चश्मा चढ़ा था, वह हर किरदार में भ्रष्ट अंग टटोल रहा था। मंडली की आवाज पर 'मंत्रीÓ (चाय वाले को पत्रकार यहां प्यार से मंत्री बुलाते हैैं) ने चाय पेश की। पांच रुपए का एक प्याला। स्टेशन चार्ज। हर जगह चाय तीन रुपए में एवैलेवल है, लेकिन मंत्री स्पेशल यहां पांच रुपए पार है। खैर दूध महंगा भी हो चला है, सो मेरे चश्मे ने इसे हजम कर लिया। देर तक 'गपास्टिंगÓ चली। इंडिया से इंग्लैैंड तक और अन्ना से ओबामा तक पर हम कथित बुद्धिजीवियों ने बाल का खाल निकाल दिया। डेढ़ बजने को आये थे। तभी कोड़ा कांड की चर्चा की ओर मेरा ध्यान गया। प्लेटफॉर्म पर बने सुलभ शौचालय के ठीक बाहर दो मुसाफिर शौचालय संचालक को कोड़ा कांड की याद दिला-दिला कर खूब हड़का रहे थे। कहने मं दोनों की भषा उड़ीसा की लग रही थी। एक बोला-यहां कोड़ा ने तो करोड़ों का घोटाला किया ही किया, झारखंड में तो शौचालय तक में भ्रष्टाचार हावी है। महाशय के कथन पर पहले तो मुझे गुस्सा आया। लगा कि बाहर से आकर झारखंड को गाली....अभी औकात बताता हूं। लेकिन उनके तर्क और तथ्य पर  ध्यान गया तो वास्तव में हालात पर हंसना में आया और रोना भी। हुआ यूं कि एक महाशय शौचालय गए, लौटने पर शौचालय संचालक ने उनसे पांच रुपए मांग लिए। जबकि सरकारी रेट चार्ट में साफ-साफ लिखा था टायलेट जाने के दो रुपए। इसी बात पर बात बिगड़ी। शौचालय में भ्रष्टाचार देख दोनों महाशयों ने आसमान सिर पर उठा लिया। उनकी बात जायज भी थी, आखिर झारखंड में सदन से शौचालय तक के भ्रष्टाचार को उन्होंने खड़े-खड़े गिनवा दिया। शौचालय के बाहर देखते ही देखते अर्जुन मुंडा के ब्रांड झारखंड की ऐसी की तैसी हो गई। हिम्मत नहीं हुई उन दो महाशयों के मुंह लगने की, उल्टे मन किया कि शौचालय संचालक को दो-तीन हाथ जमा दिया जाए, लेकिन ख्याल आया कि सदन में भी ऐसी ही लूट मची है। वहीं बड़ी लूट, यहां छोटी लूट...। लेकिन लूट तो लूट होती है, और भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार। खैर आज का सफर भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू की गई जंग के संभावित नतीजे की ओर इशारा कर गया, लेकिन इतना जरूर अच्छा हुआ कि मेरी आंखों में भ्रष्टाचार को देख पाने वाला चश्मा चढ़ गया, जो कल तक नहीं था। इतना जरूर हुआ कि कल तक जो भ्रष्टाचार मेरे गले से अमृत की तरह उतर जाता था, आज वह नीम से ज्यादा कड़वा लग रहा था। अंत में अपने आप को यह सांत्वना देते घर के लिए ठंडी हवा खाते रवाना हो गया कि शायद मेरी आंखों में जो चश्मा चढ़ा वह बाकी की आंखों में भी चढ़ेगी, मेरे गले को जो कड़वा लगा वो दूसरों को भी कड़वा लगेगा...लेकिन यारों कम से कम शौचालय तक तो भ्रष्टाचार को गिरने मत दो। बड़े लोगों की बूरी आदलों से हम छोटे लोगों को तो दूर रखो। डायबिटिीज अमीरों को होने दो हमें मजदरी करते ही मरने के लिए छोड़ दो....। अपने अंदर सोए अन्ना को अब तो जागने दो....।