Friday, March 18, 2011

bhado majhi

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Wednesday, February 9, 2011

Bhado Majhi

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खरसावां में जीत हार के मायने

भादो माझी, खरसावां
लगातार राजनीतिक अस्थिरता से जूझते झारखंड के लिए खरसावां में जीत-हार के कई मायने हैं। यहां सवाल सिर्फ अर्जुन मुंडा या बाबूलाल मरांडी की जीत-हार का नहीं है। मजबूती से कदम बढ़ा रहे मुंडा जीते तो सरकारी मशीनरी को गति मिलेगी। लोकप्रिय सरकार तेजी से काम करेगी। अधूरी योजनाएं पूरी होंगी। राष्ट्रीय खेलों सरीखे कुछ प्रतिष्ठा परक काम होंगे। लेकिन यदि हारे तो..? इसका जवाब कठिन है।
खरसावां विधानसभा के मतदाता व गम्हरिया के नारायणपुर निवासी गम्हरिया प्रखंड के नारायणपुर के रवि चन्द्र महतो कहते भी हैं-मुंडा को विजयी बनाने से ही झारखंड की राजनीति में फिलहाल स्थिरता आयेगी। वरना फिर अनिश्चय की स्थिति। सरकारी मशीनरी ठप। जैसा कि जनसभा में केंद्रीय पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय कहते भी हैं कि खरसावां की जनता ही इतिहास बनायेगी। स्थिरता का या कुछ और। हां, इतना होगा कि झाविमो का विधायक बल 11 से बढ़कर 12 हो जाएगा।
खरसावां सजग है। सलाइडीह निवासी बुधराम होनहागा कहते हैं- सड़क, बिजली और पानी से विकास की बात की जाती है। खरसावां में यह सब कुछ दिखता है। कुछ चीजें रह गई हैं लेकिन उसके लिए खरसावां के साथ पूरे राज्य का नेतृत्व बदल दिया जाए तो शायद फिर एक बार विकास का पहिया थम जाएगा। डोडा गांव इसकी तस्दीक भी करता है। राज्य बनने और यहां से मुख्यमंत्री का नेतृत्व मिलने से आकर्षणी से 10 किलोमीटर आगे सुदूर गांव में भी रात में रोशनी गुलजार दिखती है तो सड़के चमकती नजर आती हैं। डोडा गांव निवासी
सुशेन महतो कहते है-मुंडा ने विधायक रहते जितना काम किया उससे कहीं आगे बढ़ कर कल्याण मंत्री और मुख्यमंत्री रहते किया।
पड़ोस के सलाईडीह में बिजली आपूर्ति की तैयारी पूरी दिखती है। सलाईडीह निवासी गणेश बुड़ीउली के मुताबिक यहां बिजली आ जाए तो परेशानी ही खत्म हो जाए। सड़क बन गयी है बिजली भी आ ही जाएगी। लेकिन लाख टके का सवाल है सबके फायदे की बात समझ में किसे आयेगी?

अर्जुन के गांव में जीत का इंतजार

अर्जुन के गांव में  जीत का इंतजार
भादो माझी, खेजुरदा (खरसावां)
मैं खेजुरदा में हूं, यह वही गांव है जहां मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के बाप-दादा पले बड़े। खुद अर्जुन ने भी अपने बचपन के दिन यहीं गुजारे। गांव का झोपड़ीनुमा घर मुंडा के चुनावी पोस्टर के साथ खड़ा है। यहां की  जायदाद की देखरेख करने वाली उर्मिला प्रमाणिक पूरे दावे के साथ कहती हैं-अर्जुन अमार पुत्रा आछे, वोई नाई जीतबे तो के जीतबे(अर्जुन हमारा बेटा है, वह नहीं जीतेगा तो कौन जीतेगा)। मुंडा की यहां 12 बीघा जमीन है और उस पर एक फूस का घर झारखंडी विरासत को आज भी दर्शा रहा है। उनकी इसी पुश्तैनी जमीन पर खड़ा बैर का पेड़ खुद में ढेरों खट्टी-मीठी यादें समेटे है तो खजूर का पेड़ गांव के नाम को सार्थक कर रहा है। उर्मिला प्रमाणिक बताती है कि शुक्रवार को बहू मीरा मुंडा आई थी। यहां उपजाए गए बैगन लेकर गई और वादा किया कि पति (अर्जुन) के चुनाव जीतने के बाद फिर आएगी।
माहौल चुनावी है और खेजुरदा के हरघर में भाजपा के झंडे लहरा रहे हैं, लोग उत्साहित हैं। बात पड़ोसी संतोष महतो की करें या फिर गुरूबारी की। उन्हें इंतजार है तो बस अर्जुन के एक और जीत की है। ठीक वैसी ही खुशी की जो लगातार 15 साल से अर्जुन इस गांव को दे रहे हैं। कभी विधायक बन कर तो कभी कल्याण मंत्री बनकर या फिर मुख्यमंत्री बनने की खुशी। उससे भी आगे बढ़ कर तब जब संसद की दहलीज पर पहुंच खेजुरदा का मान बढ़ाया। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव के रूप में भी गांव की मिट्टी की महक पहुंचाने वाले मुंडा के प्रति खेजुरदा के लोगों का प्यार वहां के शिवालय में भी दिखता है। पड़ोसी करण प्रमाणिक कहते हैं- मुंडाजी की मां ने इस मंदिर की स्थापना गांव के लिए की है। यहां सड़क, बिजली और स्कूल उन्हींकी देन है। खरसावां बाजार और चांदनी चौक से लेकर खेजुरदा तक चुनावी उत्साह अलग-अलग रंग में है। कहीं ईंट के भट्ठे हैं तो कहींसूखे खेत में जिंदगी तलाशते लोग। लेकिन एक चीज हर जगह सामान्य है-अर्जुन का एक और युद्ध, वही अर्जुन जिसने हर बार लक्ष्य पर निशाना साधा है। अब बारी एक और अग्नि परीक्षा की है।
(इनसेट)
...लेकिन खेजुरदा में एक और कहानी भी है
खरसावां: अर्जुन मुंडा के गांव खेजुरदा में एक और कहानी भी है। गांव के परगना जीतराम टुडू के निधन की कहानी। उनका निधन अर्जुन के सीएम के तौर पर तीसरी बार शपथ लेने के दूसरे ही दिन हो गया था। उनकी विधवा सारो टुडू आज भी अर्जुन का इंतजार कर रही है जो कभी उनकी गोद में खेला करता था। आंखों में छलकते आंसुओं को छिपा कर सारो लड़खड़ाती जुबान से कहती है- मीरा तो आई लेकिन अर्जुन घर नहींआए। उनके मरने की खबर दी थी लेकिन बताया कि दिल्ली में हैं। मीरा भी चुनाव प्रचार करने आई थी तब जब वह (सारो टुडू) घर में नहीं थी।
सारो को तकलीफ इस बात की है कि उनके हाथों पला-बढ़ा अर्जुन अब उन्हें भूल गया। तीन बेटों में किसी को नौकरी तो नसीब नहींही हुई उन्हें भी न तो वृद्धा पेंशन मिला और न विधवा पेंशन। सारो इस संवाददाता से कहती है- साहब को बता दीजिएगा कि उन्हें बचपन में खाना खिलाने वाले हाथों को अब कुछ भी नसीब नहींहै।