Wednesday, August 17, 2011

जमशेदपुर - टीवी पर मार्मिक स्टोरी में नेताजी की मौजा ही मौजा



भादो माझी, जमशेदपुरः गुरुवार की एक औसत सुबह! रिमोट को सारथी बना टीवी पर कुछ सार्थक ढूंढ़ रहा था। पर ज्यादातर टीवी कायक्रम गुरुवार की सुबह से भी ज्यादा औसत थीं। धार्मिक चैनलों पर कुछ बाबा महिलाओं को शांति और संयम का पाठ पढ़ा रहे थे। नेशनल न्यूज चैनल वाले बता रहे थे कि कैसे एक बाबा ने संयम का पाठ पढऩे आई शिष्या को एक्सट्रा क्लास देने की कोशिश की। वहीं मनोरंजन चैनल्स पर सास-बहुएं एक-दूसरे को नीचा दिखाने के ऊंचे काम में लगी हैं, दूसरों का खून पी अपना हीमोग्लोबीन बढ़ा रही हैं। कल्पना के कैनवस पर हर क्षण षड्यंत्रों के दृश्य उकेर रही हैं। कभी-कभी हैरानी होती है कि धारावाहिकों में जिन परिवारों की कहानी देख हम मनोरंजन करते हैं, खुद उन परिवारों में कितना तनाव है! आखिर क्या वजह है कि दूसरे का तनाव हमें आनंद देता है? किसी का झगड़ा देख हम एंटरटेन होते हैं? क्या हम इतना गिर गए हैं...हमारे पास कुछ और काम नहीं बचा...इससे पहले कि किसी महान नतीजे पर पहुंचता, सोचा पॉकेट में चैनल आईडी ढूंसे वीडियो कैमरा लेकर कालिया चाय दुकान (डीसी ऑफिस के सामने) से जुुबिली लेक तक सड़कों पर तूफानी सैर करने वाले लोकल न्यूज वालों का करतब ही देख लिया जाए। करतब कमाल का था। लोकल टीवी पर न्यूज चल रही थी, न्यूज रीडर लाउड लिपिस्टिक पोते होंठ पहले हिला रही थे बोल बाद में रही थी। शायद टेक्निकल फॉल्ट था। बहरहाल शहर का मिजाज जानने की चस्की चढ़ी, सो टीवी वाली मैडम के होंठों को इग्नोर कर कंटेट पर ध्यान दिया। टीवी वाली मैडम ने चेहरे में हल्की मुस्कान लिए एक ऐसे मार्मिक स्टोरी दे मारी कि हमारी मैडम च.च..च.. करने लगी। दरअसल सीन मैरीन ड्राइव और रामजनमनगर का आ रहा था। पुलिस वाले विलेन और बस्ती वाले मिठुन चक्रवर्ती ब्रांड हिंदी फिल्म के गरीब गुरबा लग रहे थे। सीन ड्रामेटिक था, लेकिन इमोशनल ज्यादा लग रहा था। हमारी मैडम जी बंध गई, सो हमरा भी इस न्यूज में इंटरेस्ट दिखाना कंपलसरी था। सो लोकल न्यूज चैनल वालों की पेशकश पर नजरें टिक गईं। अतिक्रमण हटाया जा रहा था, सो लोग रो रहे थे, बिलख रहे थे। घर उजड़ रहे थे। यह सब देख च..च..च.. कंटिन्यू था। समझाने का कोई फायदा नहीं हुआ कि जमीन अवैध है तो आज नहीं तो कल हटना ही था। तपाक से सवाल दागती कि हटाना था तो बसाने समय क्यों नहीं रोका...? सवाल में दम था, सो हमारा तेवर बेदम हो गया। बहरहाल लोकल न्यूज पर इमोशनल सीन जारी था। इतने में इंट्री हुई एक शख्स की। साथ में थे उनके झंडरबरदर। न्यूज चैनल पर साहब को इंट्रोडक्शन जनप्रतिनिधि के रूप में की गई। जनाब आज रामजनमनगर में न्यूज चैनलों की बाढ़ देख जोश के समंदर में गोते पर गोते लगा रहे थे। पहले तो घर नहीं टूटने देंगे बोले, चैनल आइडी जब-जब उनकी और दिखता नेताजी बाइट (बयान) देने के लिए कॉलर टाइट कर देते। मौका मिला तो दहाड़ पड़े। प्रशासन ठीक नहीं कर रही...। हम ऐसा नहीं होने देंगे...। नापी गलत हुई है...। प्रशासन गलत कर रही है...। आदि...आदि। लेकिन नेताजी की आज चली नहीं। नारेबाजी करते विलेन बनी प्रशासन के आगे-पीछे होते रहे। फिजिकल प्रेजेंस जरूरी थी, आखिर अगली बार का सवाल जो था। नेताजी ने इतने समय में जितनी बार आग उगला उतनी बार उनके चेहरे पर वीरता के भाव दिखे। लेकिन उजड़ी जनता को आज फुर्सत न थी अपने गम से। पहले तो नेताजी पर उम्मीद जताई, लेकिन हांकता व फांकता देख नेताजी को देख खुद भी बगले झांकने लगे। नेताजी लोकल लीडर हैैं, लेकिन आज सिर्फ टीवी वाले उनके वोटर लग रहे थे। टीवी वालों को छोड़ कोई पूछ नहीं रहा था। सिर्फ वही क्यों, फ्लैशबैक पर टीवी में एक और चेहरा नहीं टूटने देंगे मकान के दावे करता दिखाया जा रहा था। साहब सरकार की पार्टी के हैैं। एक बार सत्ता की धाक दिखाई भी, बस्ती को बचाया भी। लेकिन चुनाव खत्म और साहब के दर्शन दुर्लभ। इन चैनल वालों की याददाश्त भी बड़ी जालिम होती है। चुनाव के पहले की बात अब तक याद रखे हुए हैैं। भई चुनाव खत्म अब तो बख्श दो नेताजी को। बेचारे हार भी गए हैैं। नहीं आए तो नहीं आए, आखिर लोकल लीडर आए तो थे, क्या हो गया। घर टूट ही न गया। लेकिन चैनल वालों की तरह हमारी मैडम भी बड़ी तीखी निकली...बोलीं नेता कभी नहीं सुधरेंगे। राजनीति की रोटी सेंकनी हों तो चिता की आग भी न छोड़ें...। शायद मैडम सही हैैं.... !

Wednesday, August 10, 2011

Bhado Majhi

Bhado Majhi